मुंबई | 1 अगस्त 2025
मालेगांव बम धमाके के लगभग दो दशक बाद आज मुंबई की एनआईए कोर्ट ने इस मामले में सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया, जिनमें बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भी शामिल थीं। कोर्ट ने कहा कि सबूत अपर्याप्त हैं, लिहाजा किसी को दोषी ठहराना संभव नहीं है।
लेकिन जैसे ही कोर्ट का फैसला आया, पीड़ित परिवारों की पीड़ा एक बार फिर ताज़ा हो गई। फरहीन और अजहर, जिनकी उम्र उस वक्त महज़ 10 और 12 साल थी, उन मासूमों की मौत अब भी न्याय की तलाश में है।
"हमारा बेटा मारा गया, पर अब कोर्ट कहती है कोई दोषी नहीं है, तो फिर उसे मारा किसने?" — यह सवाल अजहर के पिता की आंखों में आंसू और गले में दर्द बनकर सामने आया।
क्या हुआ था 2006 में?
8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में एक मस्जिद के पास जुमे की नमाज़ के बाद सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इन धमाकों में 4 बच्चों समेत 37 लोगों की मौत हुई और सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
शुरुआत में मामला महाराष्ट्र ATS ने संभाला और फिर बाद में एनआईए को सौंपा गया।
कौन थे आरोपी?
इस केस में 2008 में प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित और 5 अन्य को गिरफ्तार किया गया। जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि यह एक "हिंदू आतंकवाद" से जुड़ा मामला है। लेकिन लंबी सुनवाई और कई गवाहों के पलटने के बाद आज अदालत ने सबको बरी कर दिया।
पीड़ित परिवारों का दर्द
कोर्ट के फैसले के बाद पीड़ित परिवारों का सवाल सीधा और कड़वा है —
"हमने अपने बच्चे खो दिए, हमारी ज़िंदगी तबाह हो गई, लेकिन अब कोई दोषी नहीं? क्या हमारे बच्चों की मौत यूं ही गई?"
फरहीन की मां ने कहा, "हमें उम्मीद थी कि सालों बाद हमें इंसाफ मिलेगा, लेकिन आज फिर हमें खाली हाथ लौटना पड़ा।"
अब आगे क्या?
कानूनी जानकारों के मुताबिक एनआईए कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की जा सकती है। लेकिन सवाल यही है कि अगर सभी आरोपी बरी हो गए हैं, तो फिर 2006 के मालेगांव ब्लास्ट का जिम्मेदार कौन?
