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शुभांशु का स्वागत करने के लिए एयरपोर्ट पर भारी भीड़ जमा थी. डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक उन्हें लेने पहुँचे. स्कूली बच्चे एस्ट्रोनॉट की ड्रेस में तैयार होकर आए थे और अपने हीरो का स्वागत कर रहे थे. पूरा एयरपोर्ट ढोल-नगाड़ों और 'भारत माता की जय' के नारों से गूंज रहा था. शुभांशु पहले एक खुली जीप और फिर एक रथ पर सवार होकर रोड शो करते हुए अपने बचपन के स्कूल पहुँचे, जहाँ रास्ते भर लोग फूल बरसाकर उनका अभिनंदन कर रहे थे.स्कूल में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान, जब शुभांशु की माँ आशा शुक्ला और बहन को स्टेज पर बुलाया गया, तो वे बहुत भावुक हो गईं. माँ ने अपने बेटे को गले लगाकर रोना शुरू कर दिया, जिसे देखकर शुभांशु की आँखें भी नम हो गईं.अपने भाषण में शुभांशु ने कहा कि दिल्ली में भी उनका स्वागत हुआ था, लेकिन लखनऊ जैसा स्वागत कहीं और नहीं हुआ. उन्होंने छात्रों से कहा, "मैं यहीं पला-बढ़ा हूँ. मैं उतना टैलेंटेड नहीं था, जितने आप लोग हैं, लेकिन मैंने धैर्य रखा." उन्होंने यह भी बताया कि उनसे किसी ने अंतरिक्ष यात्रा के बारे में नहीं पूछा, बल्कि सबने यही जानना चाहा कि वह अंतरिक्ष यात्री कैसे बने.कार्यक्रम के दौरान जब एक सवाल के जवाब में शुभांशु से पूछा गया कि उन्होंने अपनी पत्नी कामना को क्यों चुना, तो वह थोड़ा शर्मा गईं. इस पर शुभांशु ने कहा कि कामना में एक अनोखा गुण है—वह बहुत दूरदर्शी हैं और जानती हैं कि भविष्य में क्या चीज़ सफल होगी. यह सुनकर पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा.

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अपनी 18 दिवसीय अंतरिक्ष यात्रा के बाद शुभांशु शुक्ला 15 जुलाई, 2025 को पृथ्वी पर लौटे. Axiom-4 मिशन के तहत, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर 20 दिन बिताए थे. धरती पर लौटने के बाद, वे 17 अगस्त को भारत आए और अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले.लखनऊ के मूल निवासी शुभांशु, लगभग डेढ़ साल बाद अपने गृहनगर पहुँचे हैं. उनके आने से पहले, उनके परिवार—पिता शंभु दयाल और माँ आशा शुक्ला—के घर की गलियों का नवीनीकरण कराया गया, ताकि उनके स्वागत में कोई कमी न रहे.

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1. अंतरिक्ष यान को चलाने का सीधा अनुभव

एक्सियम-4 मिशन में पायलट की भूमिका में शुभांशु ने हर चरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया, चाहे वह यान की लॉन्चिंग हो, कक्षा में पहुँचना हो, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से जुड़ना हो या सुरक्षित लैंडिंग.प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक तपन मिश्रा के अनुसार, ISRO ने गगनयान के लिए चुने गए भारतीय वायु सेना के चार पायलटों को सिम्युलेटर पर गहन प्रशिक्षण दिया है, लेकिन किसी को भी वास्तविक अंतरिक्ष यान को चलाने का सीधा अनुभव नहीं मिला है. शुभांशु को मिला यह अनुभव, जो किसी भी सिमुलेशन से कहीं अधिक सटीक है, गगनयान के लिए अमूल्य है. वे उड़ान के दौरान आने वाली छोटी-छोटी तकनीकी खामियों को भी पहचान सकेंगे, जिससे मिशन की सफलता सुनिश्चित हो सकेगी.

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2. आपातकालीन स्थितियों और संचार को संभालना

शुभांशु को अंतरिक्ष में यान को नेविगेट करने, संचार स्थापित करने और आपातकालीन स्थितियों को संभालने की विशेष ट्रेनिंग मिली थी. पूरे मिशन के दौरान, यान को नियंत्रित करने और पृथ्वी पर मौजूद मिशन कंट्रोल टीम के साथ संवाद करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी. यह अनुभव और उनका अभ्यास गगनयान के पायलटों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा.

3. माइक्रोग्रैविटी में शरीर पर शोध

अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण (माइक्रोग्रैविटी) बहुत कम होता है, जिससे काम करना मुश्किल हो जाता है और मानव शरीर पर भी इसका असर पड़ता है. शुभांशु ने एक्सियम-4 मिशन के दौरान माइक्रोग्रैविटी में काम करने की चुनौतियों को समझा और शरीर में होने वाले बदलावों का बारीकी से अध्ययन किया. इस जानकारी से ISRO को गगनयान के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बेहतर चिकित्सा तैयारी करने में मदद मिलेगी.

4. अंतरिक्ष में जीवनशैली का अनुभव

शुभांशु ने अंतरिक्ष में रहने की जीवनशैली को खुद अनुभव किया है. उन्हें विशेष स्पेस सूट, भोजन और कचरा प्रबंधन के उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया था. उन्होंने अंतरिक्ष में खाने-पीने और वॉशरूम जैसी सुविधाओं का भी इस्तेमाल किया. उनके ये अनुभव गगनयान मिशन के लिए बेहतर विकल्प तैयार करने में मददगार होंगे, ताकि भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को कम से कम परेशानियों का सामना करना पड़े.


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