अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पहली बार, उसके कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी गुरुवार को सात दिवसीय यात्रा पर दिल्ली पहुंचे हैं।
यात्रा का उद्देश्य
- विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने X पर पोस्ट कर मुत्तकी का गर्मजोशी से स्वागत किया।
- उन्होंने कहा कि भारत, मुत्तकी के साथ द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत करने के लिए उत्सुक है।
- मुत्तकी की यात्रा, अगस्त 2021 के बाद काबुल से दिल्ली की पहली मंत्री स्तरीय यात्रा है।
कूटनीतिक दुविधा: किस झंडे का प्रयोग होगा?
मुत्तकी की यह यात्रा भारतीय विदेश मंत्रालय के सामने एक कूटनीतिक समस्या खड़ी कर रही है, खासकर शुक्रवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर से उनकी संभावित मुलाकात को लेकर:
- विवादित प्रश्न: मुख्य सवाल यह है कि जब मुत्तकी और जयशंकर की मुलाकात होगी, तो उनके पीछे कौन सा झंडा लगाया जाएगा—तालिबान का सफेद झंडा या अफगानिस्तान का पारंपरिक तिरंगा झंडा?
- अमान्यता की स्थिति: यह दुविधा इसलिए है क्योंकि भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है।
यह 'झंडा विवाद' प्रतीकात्मक रूप से भारत के सामने मौजूद कूटनीतिक चुनौती को दर्शाता है, जिसमें वह तालिबान के साथ बातचीत जारी रखना चाहता है, लेकिन उसे आधिकारिक मान्यता देने से बच रहा है।

तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा: झंडे को लेकर कूटनीतिक चुनौती
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने कूटनीतिक हलकों में झंडे के प्रोटोकॉल को लेकर एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
मान्यता न देने से जटिल हुई स्थिति
- दूतावास में पुराना झंडा: भारत ने अभी तक तालिबान-शासित अफगानिस्तान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। इसी कारण, दिल्ली में अफगान दूतावास में अब भी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान (अपदस्थ राष्ट्रपति अशरफ गनी के शासन का) का पारंपरिक झंडा फहराया जाता है।
- प्रोटोकॉल की बाध्यता: जब एक विदेशी मंत्री (मुत्तकी) मेजबान देश के विदेश मंत्री (एस. जयशंकर) से मिलते हैं, तो कूटनीतिक नियमों के अनुसार मेजबान देश (भारत) का झंडा और मेहमान देश का झंडा दोनों बैठक के दौरान उनके पीछे या मेज पर रखे जाने चाहिए।
भारत के सामने दुविधा
चूंकि भारत आधिकारिक तौर पर तालिबान सरकार को मान्यता नहीं देता, इसलिए मुत्तकी के देश का झंडा लगाना एक बड़ी मुश्किल है।
- अधिकारी कर रहे विचार: सूत्रों के अनुसार, भारतीय अधिकारी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि बिना औपचारिक मान्यता दिए कूटनीतिक प्रोटोकॉल का पालन कैसे किया जाए।
- पिछला उदाहरण: इससे पहले, जनवरी में दुबई में भारतीय अधिकारियों और मुत्तकी के बीच हुई पिछली बैठकों में किसी भी झंडे (न भारतीय, न तालिबान) का इस्तेमाल नहीं किया गया था।
- हालांकि, यह बैठक तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा: झंडे को लेकर कूटनीतिक चुनौती
- अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने कूटनीतिक हलकों में झंडे के प्रोटोकॉल को लेकर एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

तालिबान विदेश मंत्री का भारत दौरा: जयशंकर से मुलाकात और सांस्कृतिक एजेंडा
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की सात दिवसीय भारत यात्रा में राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक और धार्मिक-सांस्कृतिक पहलुओं को शामिल किया गया है। मुत्तकी को इस दौरान आधिकारिक विदेश मंत्री के समान प्रोटोकॉल दिया जाएगा।
प्रमुख मुलाकातें और प्रोटोकॉल
- एस. जयशंकर से बैठक (10 अक्टूबर): मुत्तकी की सबसे अहम राजनीतिक मुलाकात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हैदराबाद हाउस में तय है। इस उच्च-स्तरीय स्थल पर बैठक होना मुत्तकी को दिए जा रहे प्रोटोकॉल को दर्शाता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल से संभावित मुलाकात: सुरक्षा और आतंकवाद निरोध जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा के लिए मुत्तकी की NSA अजीत डोभाल से भी अलग से मुलाकात हो सकती है।
बातचीत का मुख्य एजेंडा
सूत्रों के अनुसार, द्विपक्षीय बातचीत में निम्नलिखित प्रमुख मुद्दे शामिल हो सकते हैं:
- मानवीय और व्यापारिक मामले: अफगानिस्तान में मानवीय सहायता, अफगान छात्रों और व्यापारियों के लिए वीजा में सुविधा, और शुष्क मेवों का निर्यात।
- क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद: TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) पर लगाम लगाने सहित क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर रोक।
- अंतर्राष्ट्रीय मान्यता: अफगान सरकार की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और भारत में तालिबान की राजनयिक मौजूदगी बढ़ाने का प्रस्ताव।
- कनेक्टिविटी: चाबहार रूट और पोर्ट-लिंक के माध्यम से व्यापारिक संपर्क।
- व्यापारिक बैठक: मुत्तकी नई दिल्ली में एक प्रमुख चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित उद्योग और व्यापार प्रतिनिधियों के साथ भी बैठक करेंगे।
धार्मिक और सांस्कृतिक दौरा
मुत्तकी की यात्रा राजनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं है। उनका सांस्कृतिक और धार्मिक एजेंडा भी महत्वपूर्ण है:
- दारुल उलूम देवबंद (11 अक्टूबर): मुत्तकी सहारनपुर के प्रसिद्ध दारुल उलूम देवबंद मदरसे जाएंगे। यह संस्थान वैश्विक मुस्लिम समुदाय में एक महत्वपूर्ण धार्मिक और वैचारिक केंद्र माना जाता है।
- ध्यान दें: पाकिस्तान में स्थित दारुल उलूम हक्कानिया, जिसे 'तालिबान की यूनिवर्सिटी' भी कहा जाता है, इसी देवबंद मॉडल पर बना था, और कई चर्चित तालिबानी कमांडर यहाँ से पढ़े हैं।
- ताजमहल (12 अक्टूबर): वे आगरा में ताजमहल का भी दौरा करेंगे।
यह यात्रा अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से भारत और अफगानिस्तान के बीच औपचारिक संबंध न होने (मान्यता न देने) की पृष्ठभूमि में, एक महत्वपूर्ण बैकडोर डिप्लोमेसी और जुड़ाव का संकेत देती है।
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार, तालिबान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा और दोनों पक्षों के बीच चल रही बातचीत से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारत अब तालिबान सरकार को गंभीरता से ले रहा है।

विशेषज्ञ राय और भारत की नीति में बदलाव
1. तालिबान को 'प्रतिनिधि संस्था' के रूप में स्वीकारना
JNU के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर राजन राज के अनुसार:
- गंभीरता का संदेश: भले ही भारत ने तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उच्च-स्तरीय बातचीत और मंत्री का दौरा यह संदेश देता है कि भारत अब तालिबान सरकार को गंभीरता से ले रहा है।
- दीर्घकालिक स्वीकार्यता: भारत को यह एहसास हो गया है कि तालिबान अफगानिस्तान में लंबे समय तक रह सकता है, इसलिए उनके साथ बातचीत करना क्षेत्रीय हितों के लिए आवश्यक है।
- आंतरिक संघर्ष की समाप्ति: ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान में आंतरिक संघर्ष खत्म हो चुका है और तालिबान की सत्ता को स्वीकार कर लिया गया है। राजन राज के अनुसार, तालिबान अब एक ऐसी सत्ता में है जो करीब-करीब सभी गुटों को साथ लेकर चल रही है, जो इसे पहले की सरकारों से अलग बनाता है।
2. मजबूत अफगानिस्तान की धारणा
प्रोफेसर ओमैर अनस के अनुसार:
- पिछली सरकार की तुलना: उनका मानना है कि अफगानिस्तान में इससे पहले की सरकार लोकप्रिय नहीं थी और उसकी पश्चिमी देशों पर अत्यधिक निर्भरता थी। इस कमजोरी के कारण पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों को अफगानिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका मिलता था।
- मजबूत सत्ता: जब से तालिबान की सरकार आई है, तब से एक "मजबूत अफगानिस्तान" की धारणा सामने आई है, जिसने शायद पड़ोसी देशों के हस्तक्षेप की संभावना को कम कर दिया है।
कुल मिलाकर, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह नीति व्यावहारिक अनिवार्यता पर आधारित है, क्योंकि भारत ने अफगानिस्तान की राजनीतिक वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है और वह अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए तालिबान के साथ जुड़ाव बढ़ा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, प्रोफेसर राजन राज के अनुसार, तालिबान-शासित अफगानिस्तान के लिए भारत के साथ संबंध बढ़ाना एक व्यावहारिक मजबूरी है, जिसके पीछे कई आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा हित छिपे हैं।
1. प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक लाभ
- आर्थिक प्रतिबंध कम कराना: प्रोफेसर राजन कहते हैं कि अफगानिस्तान भारत के ज़रिए अपने ऊपर लगे अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी और आर्थिक प्रतिबंधों को कम करा सकता है। यही वजह है कि तालिबान भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है।
- भारत की मानवीय मदद: हाल ही में अफगानिस्तान में आए भूकंप के बाद भारत ने काफी मदद और राहत सामग्री भेजी थी, जिसने दोनों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में मदद की।
2. क्षेत्रीय हितों की रक्षा और ‘FOMO’
- बड़ी शक्तियों से जुड़ाव: रूस, चीन और अमेरिका जैसी सभी बड़ी शक्तियां अफगानिस्तान से बात कर रही हैं। ऐसे में भारत को लगता है कि अगर वह पीछे रहा, तो दक्षिण एशिया (South Asia) में उसके हित प्रभावित होंगे।
- विलंब का डर (FOMO): राजन राज के अनुसार, भारत द्वारा यह कदम उठाने के पीछे एक वजह 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' (FOMO) भी हो सकती है। भारत, अफगानिस्तान में पहले भी बुनियादी ढांचा विकसित करने में बड़ी मदद कर चुका है, और अब वह तालिबान सरकार आने के बाद आए 'गैप' को भरने की कोशिश कर रहा है।
3. सुरक्षा और स्थिरता
- कट्टरपंथी गुटों का खतरा: भारत लंबे समय तक इस मुलाकात को टालता रहा, लेकिन अब यह ज़रूरी हो गया था। अगर भारत बातचीत नहीं करता, तो वहाँ के कट्टरपंथी आतंकी गुट भारत विरोधी हो सकते थे।
- तालिबान की जिम्मेदारी: बातचीत शुरू होने से अब तालिबान की यह जिम्मेदारी बन जाएगी कि वह अपनी ज़मीन पर भारत विरोधी गतिविधियों को न होने दे।
संक्षेप में, अफगानिस्तान अपने आर्थिक अलगाव को तोड़ने, क्षेत्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने और भारत जैसे एक बड़े पड़ोसी को सुरक्षा गारंटी देने के लिए भारत के साथ संबंध मजबूत कर रहा है।