हरदा।
हरदा के नेहरू स्टेडियम में 21 दिसंबर को आयोजित करणी सेना का विशाल आंदोलन अब कई सवालों के घेरे में है। 21 सूत्रीय मांगों को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन लगभग 11 घंटे तक चला, जिसमें प्रदेशभर से करीब 20 हजार कार्यकर्ता शामिल हुए। लेकिन प्रशासन द्वारा केवल एक प्रमुख मांग माने जाने के बाद ही आंदोलन समाप्त कर दिया गया, जिससे आंदोलन के उद्देश्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इतना बड़ा आयोजन सिर्फ पुलिस कार्रवाई के मुद्दे तक सीमित था?

लाठीचार्ज बना आंदोलन का केंद्र
असल में इस आंदोलन की जड़ जुलाई 2025 में हुए हरदा लाठीचार्ज से जुड़ी है। उस समय करणी सेना के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया था और कई पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें संगठन प्रमुख जीवन सिंह शेरपुर भी शामिल थे। तभी से करणी सेना दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई और जांच की मांग कर रही थी।
जैसे ही जिला प्रशासन ने
दोषी पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच करने
और लाठीचार्ज मामले में मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए
उसी के बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी गई।

“यह केवल एक समाज का आंदोलन नहीं” – करणी सेना
आंदोलन से पहले करणी सेना ने इसे सर्व समाज से जुड़ा मुद्दा बताया था। संगठन का दावा था कि 21 सूत्रीय मांगों में शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सुरक्षा और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दे शामिल हैं, जो सभी वर्गों से जुड़े हैं।
आंदोलन की तैयारी करीब 10 दिन पहले से शुरू कर दी गई थी। राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों से पदाधिकारी हरदा पहुंचे थे। सुबह से ही कार्यकर्ता स्टेडियम में जुटने लगे और दोपहर में आमरण अनशन शुरू हुआ।
तय समयसीमा और बढ़ता दबाव
करणी सेना ने प्रशासन को दोपहर 3 बजे तक का अल्टीमेटम दिया था। मांगें पूरी न होने पर सड़क पर उतरने, भोपाल और दिल्ली कूच तक की चेतावनी दी गई। मंच से नेताओं ने कहा कि अनुशासन को कमजोरी न समझा जाए।
करीब 6 बजे तक यह साफ कर दिया गया कि बिना ठोस निर्णय के आंदोलन खत्म नहीं होगा। इसी दौरान संगठन के भीतर राजनीतिक दल बनाने की मांग भी उठी, जिसे मंच से समर्थन मिला।

आखिर क्यों मानी गई सिर्फ एक मांग?
शाम करीब 7 बजे प्रशासन और करणी सेना पदाधिकारियों के बीच अंतिम दौर की बातचीत हुई। इसमें हरदा लाठीचार्ज को लेकर कार्रवाई पर सहमति बनी। इसके बाद:
कुछ पुलिस अधिकारियों को लाइन अटैच किया गया
मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए गए
इसके बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया।

पूर्व पदाधिकारी का आरोप– पहले भी सरकार पलट चुकी है
करणी सेना के पूर्व संगठन मंत्री शैलेंद्र सिंह झाला ने कहा कि इससे पहले भी भोपाल में हुए आंदोलन के बाद सरकार ने आश्वासन दिए थे, लेकिन मांगें पूरी नहीं की गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पहले भी बनी कमेटियों के जरिए मांगों को टाल चुकी है।
उनका कहना है कि:
जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में जो मांग थी, वह मान ली गई
बाकी मांगें राज्य और केंद्र सरकार से जुड़ी हैं, जिन पर आगे बातचीत होगी
नई पार्टी का संकेत
आंदोलन के दौरान मंच से यह भी ऐलान किया गया कि करणी सेना राजनीतिक दल बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। नेताओं का कहना है कि उनकी आवाज सदन तक नहीं पहुंच पा रही, इसलिए अब राजनीतिक रास्ता अपनाना जरूरी है।
करीब 20 हजार लोगों की मौजूदगी वाला यह आंदोलन केवल एक मांग पूरी होने के बाद समाप्त हो गया। इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि 21 सूत्रीय आंदोलन का वास्तविक फोकस क्या था। हालांकि करणी सेना के पदाधिकारी दावा कर रहे हैं कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और बाकी मांगों के लिए सरकार से आगे बातचीत की जाएगी।