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नवंबर के आंकड़ों ने खोली असली तस्वीर

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए भारी आयात शुल्क को शुरुआत में भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा था। 50% तक के टैरिफ, ऊपर से रूस से तेल खरीदने को लेकर अतिरिक्त जुर्माना—इन फैसलों के बाद माना गया कि भारत का अमेरिका को निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा। सितंबर और अक्टूबर के आंकड़ों ने इस आशंका को कुछ हद तक सही भी साबित किया।

लेकिन नवंबर 2025 में आए आंकड़ों ने पूरी कहानी पलट दी

नवंबर में भारत का निर्यात क्यों बना सरप्राइज फैक्टर

नवंबर में भारत का अमेरिका को निर्यात साल-दर-साल आधार पर 22.6% बढ़कर लगभग 7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत के कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट के लिए भी ऐतिहासिक महीना रहा।

  • कुल निर्यात: 38.13 अरब डॉलर

  • सालाना बढ़ोतरी: 19% से ज्यादा

  • अक्टूबर में गिरावट के बाद जबरदस्त वापसी

यह संकेत देता है कि टैरिफ के बावजूद अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग कमजोर नहीं हुई

व्यापार घाटे में बड़ी राहत

नवंबर में भारत का व्यापार घाटा घटकर 6.6 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले साल इसी महीने में 17 अरब डॉलर से ज्यादा था। यानी लगभग 61% की गिरावट

इसका कारण सिर्फ निर्यात नहीं, बल्कि आयात में आई कमी भी रही:

  • सोने का आयात करीब 60% घटा

  • त्योहारी सीजन के बाद मांग में सामान्यीकरण


टैरिफ के बावजूद भारत कैसे टिका रहा? 3 बड़ी वजहें

1️⃣ निर्यातकों ने खुद उठाया टैरिफ का बोझ

भारतीय निर्यातकों ने बाजार बचाने के लिए मुनाफे की कुर्बानी दी।
जहां टैरिफ के बाद कीमतें बढ़नी थीं, वहां भारतीय सप्लायर्स ने अपने मार्जिन घटाकर कीमतें लगभग स्थिर रखीं।

  • अमेरिकी खरीदार सिर्फ सीमित टैरिफ वहन कर रहे

  • शेष बोझ भारतीय कंपनियां उठा रही हैं

  • मकसद: चीन, बांग्लादेश और थाईलैंड से बाजार न गंवाना

यह रणनीति अल्पकालिक है, लेकिन इससे भारत की बाजार हिस्सेदारी बनी रही।


2️⃣ चीन और बांग्लादेश का विकल्प नहीं मिला

अमेरिका के लिए भारत सिर्फ एक सप्लायर नहीं, बल्कि सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है।

  • चीन पर पहले से ऊंचे टैरिफ

  • बांग्लादेश में राजनीतिक व श्रम अस्थिरता

  • वियतनाम/मैक्सिको तुरंत बड़े पैमाने पर विकल्प नहीं बन सके

नतीजा:
अमेरिकी कंपनियों को भारत पर निर्भर रहना पड़ा, भले ही कीमत थोड़ी ज्यादा क्यों न हो।


3️⃣ अमेरिकी फेस्टिव सीजन की मजबूरी

नवंबर अमेरिका में खरीदारी का सबसे बड़ा महीना होता है:

  • थैंक्सगिविंग

  • ब्लैक फ्राइडे

  • क्रिसमस सेल

सितंबर-अक्टूबर में ऑर्डर घटाए गए थे, लेकिन नवंबर में स्टॉक भरना जरूरी हो गया। इससे भारत से आयात दोबारा बढ़ा।


किन सेक्टर्स ने निर्यात को संभाला?

🔹 इलेक्ट्रॉनिक्स: सबसे बड़ा गेमचेंजर

  • निर्यात में लगभग 39% की बढ़ोतरी

  • iPhone और अन्य डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग से बड़ा फायदा

  • आईटी एग्रीमेंट के तहत कम या शून्य शुल्क

अमेरिकी टेक कंपनियां सप्लाई चेन से समझौता नहीं कर सकतीं।


🔹 इंजीनियरिंग गुड्स

  • ऑटो पार्ट्स, मशीनरी की मांग मजबूत

  • अमेरिकी वाहन कंपनियों की निर्भरता भारत पर बनी रही

  • जटिल सप्लाई चेन तुरंत शिफ्ट करना संभव नहीं


🔹 रत्न और आभूषण

  • अमेरिकी छुट्टियों और शादी सीजन की मांग

  • निर्यात में करीब 28% की बढ़ोतरी


🔹 टेक्सटाइल: आंकड़ों में बढ़त, जमीन पर संकट

यह सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में है:

  • 50% टैरिफ की सीधी मार

  • एमएसएमई यूनिट्स घाटे में काम कर रहीं

  • रोजगार पर असर, छंटनी का खतरा

यहां बढ़ता निर्यात लाभहीन है।


तो क्या ट्रंप के टैरिफ फेल हो गए?

कुछ हद तक सफल

  • भारतीय निर्यातकों का मुनाफा घटा

  • एमएसएमई पर दबाव

  • अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी महंगाई झेलनी पड़ी

मुख्य उद्देश्य में असफल

  • भारतीय सामान अमेरिकी बाजार से बाहर नहीं हुआ

  • नवंबर का उछाल टैरिफ नीति की सीमा दिखाता है

  • सप्लाई चेन टैरिफ से ज्यादा मजबूत साबित हुई


ट्रंप के टैरिफ भारत को रोक नहीं पाए, लेकिन दबाव जरूर बनाया
भारत ने रणनीति, लचीलापन और वैश्विक निर्भरता के दम पर निर्यात को संभाले रखा।

नवंबर 2025 के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक व्यापार में सिर्फ टैरिफ नहीं, बल्कि सप्लाई चेन और बाजार मजबूरी असली ताकत होती है।


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