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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने किया सम्मानित

मध्यप्रदेश की भरेवा शिल्प कला को राष्ट्रीय पहचान, बैतूल के बलदेव वाघमारे को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार

मध्यप्रदेश की पारंपरिक जनजातीय धातुकला 'भरेवा शिल्प' ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अनूठी पहचान दर्ज कराई है। नई दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बैतूल जिले के वरिष्ठ भरेवा शिल्पकार श्री बलदेव वाघमारे को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किया।
कार्यक्रम में केंद्रीय वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह भी उपस्थित रहे।
हाल ही में इस पारंपरिक कला को जीआई टैग भी मिला है, जिससे इसकी विशिष्टता को आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है।

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क्या है भरेवा शिल्प?

स्थानीय बोली में भरेवा का अर्थ है— भरने वाला
यह कला गोंड जनजाति की उप-जाति द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई गई धातु ढलाई की परंपरा है।
भरेवा कारीगर धातु को ढालकर देव-प्रतिमाएँ, धार्मिक प्रतीक, पारंपरिक आभूषण और उपयोगी वस्तुएँ बनाते हैं।

भरेवा कला की प्रमुख विशेषताएँ:

  • शिव-पार्वती, ठाकुर देव और अन्य देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ

  • गोंड समुदाय के विवाहिक और धार्मिक आभूषण— अंगूठियाँ, कटार, बाजूबंद, कड़े

  • सजावटी धातु शिल्प— बैलगाड़ी मॉडल, मोर-दीपक, घंटियाँ, झुनझुने, दर्पण फ्रेम

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में लोकप्रियता प्राप्त की हुई हस्तकृत डिज़ाइन्स


परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़ी कला

भरेवा शिल्प केवल कारीगरी नहीं, बल्कि गोंड समुदाय की आध्यात्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है।
कलाकार जिन देवताओं की मूर्तियाँ बनाते हैं, उन्हीं पर उनकी आस्था भी टिकी रहती है।
गांवों की सुरक्षा, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के प्रतीक देवताओं की छवियों को बेहतरीन ढंग से धातु में उकेरा जाता है।


टिगरिया— एक उभरता हुआ शिल्प ग्राम

बैतूल जिले का छोटा-सा टिगरिया गांव आज भरेवा शिल्प का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
श्री बलदेव वाघमारे की मेहनत और समर्पण ने न केवल इस कला को जीवित रखा, बल्कि घटती संख्या वाले कारीगरों को फिर से प्रशिक्षित कर नई पीढ़ी को इस पारंपरिक कला से जोड़ा।

उनके प्रयासों से आज गांव में कई परिवार भरेवा धातु कला को अपना आजीविका स्रोत बनाए हुए हैं।
उनका संपूर्ण सफर—

  • पिता से विरासत में मिली कला

  • वर्षों की साधना

  • अनूठी कला शैली

  • और शिल्प को पुनर्जीवित करने का संकल्प
    उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाता है।


राष्ट्रीय सम्मान— कला और कारीगरों के लिए प्रेरणा

भरेवा शिल्प को मिला यह सम्मान न केवल बलदेव वाघमारे के लिए उपलब्धि है, बल्कि मध्यप्रदेश की परंपरागत जनजातीय धरोहर के लिए गर्व का विषय है।
जीआई टैग और राष्ट्रीय पुरस्कार से इस कला के संरक्षण, संवर्धन और बाजार विस्तार को नया आयाम मिलेगा।


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